कैसे करूं मैं आज कविता ?
छंदों से करदूं आँख मिचोली,
या लिख दूं कोई सुरीली बोली ...
शब्दों की लाली रच दूं,
या रंग दूं पेचीदा अक्षरों की होली ..
कैसे करूं मैं आज कविता ?
वर्णन करूं प्रकृति का रूप,
या भर दूं पन्ने लिख बिरह का दुःख ...
बयान कर्रों कोई प्रेम गाथा,
या रुदन करूँ लिख गरीबों की भूख ...
कैसे करूं मैं आज कविता ?
लिखूं राजनीती की बातें,
या अंकित करूं माँ की ममता ...
चर्चा करूं देश के इतिहास की,
या सिध्ध करूं युवा पीड़ी की क्षमता ...
कैसे करूं मैं आज कविता ?
कलम आज तू खुद ही कवी बनजा,
अपनी स्याही से खुद ही कोई रचना रचा ...
खुली आँखों से अँधेरा देख रहा हूँ मैं,
और आँखें बंद करूं तो जैसे कोई कोहराम मचा ...
आज ना कर पाउँगा मैं कविता ...... !!
संकेत

2 comments:
ऐसी ही होती है कबिता
वह जाये जिसमे छंदों की सरिता
भावों की लालिमा, दुखों की गीता
स्वप्नों के बादल, बिरह की बेयथा
अनबूजी पहेलियाँ, सूलजी हुई कथा
ऐसी ही होती है कबिता
जिसमे लिखी तुमने सारी बाते
मनको भागई, बरबस हंसी आई
साथ लेकर रुलाई, सोच तुम्हारी बिबस्ताई
आंखे बरबस भर आई
ऐसी ही होती है कबिता
एकाकीपन की छटपटाहट,
ममता भरे शब्दों की ललक
बंद आँखों से दुनिया देखना
खुली आँखों से स्वप्नों मैं खोजना
पास रहकर भी दूर हो जाना
दूर रहकर भी हर पल साथ रहना
ऐसी लिखी तुमने कबिता
मेरे छंद स्तब्द हो गए
कबिता नहीं यह है लेखक की मनोबेय्था
शाबाश, यह ही है सचे भावों की रचयिता
ऐसे ही लिखो सदा मन से छंदों की गीता
aisi hi hoti hai kavita...
bas jaisi aapne likh dali hai apni kalam se is kagaz par...
aisi hi hoti hai kavita...
jaisi aapne dhali hai apni soch ki gagar se is kagaz par...
aisi hi hoti hai kavita...
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