Thursday, December 09, 2010





पंख अगर होते मेरे पास
रंगों में भर देता पलाश
शब्दों में भर देता उल्लास
नया पैगाम, नई अभिलाष
पंख अगर होते मेरे पास
दूरी है, मजुबरी है, नहीं हूँ हताश
बिरह में, मिलन का एहसास
उमंग है, तरंग है, मन में है बिश्वास
उड़ आऊंगा, अंतहीन हो चाहे आकाश
पंख अगर होते मेरे पास
शब्द नहीं, व्यक्त हैं बिरह का प्रकाश
कविता नहीं, छंदों में है भावों का विकाश 
मन उपवन सा, मरुस्थल सा वास
साथ नहीं, फिर भी साथ होने की आश
पंख अगर होते मेरे पास

Saturday, October 02, 2010




हट के
चाह बस अब सबकी एक ही है, लगना है हट के, 
गिरते पड़ते, लड़ते झगड़ते, भूले या भटके,
समुंदर में बहते, आसमान में उड़ते या पहाड़ो में लटके, 
चाह बस अब सबकी एक ही है, लगना है हट के . . . 

जो सब करते हैं, हम वह कर नहीं सकते, 
जिन गीतो पर दुनिया नाचती, उन पर हम्हारे पांव नहीं थिरकते,
जो जगह सबको आती पसंद , हम वहां नहीं जाते,
लोकप्रिय लेखक और कलाकार हमे रास नहीं आते . . .

फीका रंग हमें CUTE लगता और चटकीला कुछ लगता COMMON,
जकूज़ी में डूबकर हम सुकून धुंडते और पूजा पाठ को कहते पागलपन,
जब सड़कों पर बच्चे भूके मरते, हम १४११ बाघों की चिंता करते,
ट्रैफिक पुलिस को हम घूस देते, पर समलैंगिक अधिकार के लिए लड़ते . . .

पिताजी जी को पा, भाई को bro, और मित्रों को हम dude बुलाते, 
 
जन्माष्टमी की हमें खबर नहीं, पूरा दिसम्बर हम Santa के गुण गाते,
चम्मच से हम चावल खाते, और INDIANs को कहते CHEAP PEOPLE,
भिकारी देख खिड़की चढाते, और JAI HO सुन खोलते CHAMPAGNE BOTTLE . . . 

चाह बस अब सबकी एक ही है, लगना है हट के,
छोटी छोटी खुशियों को भूल, किसी जटिल सोच में अटके,
खुद से लड़के, लोगों से छुपके, एक अकेलेपन में फसके,
चाह बस अब सबकी एक ही है, लगना है हट के . . . 

Sanket

Friday, September 24, 2010

कैसे करूं मैं आज कविता ?

छंदों से करदूं आँख मिचोली,
या लिख दूं कोई सुरीली बोली ...
शब्दों की लाली रच दूं,
या रंग दूं पेचीदा अक्षरों की होली ..

कैसे करूं मैं आज कविता ?

वर्णन करूं प्रकृति का रूप,
या भर दूं पन्ने लिख बिरह का दुःख ...
बयान कर्रों कोई प्रेम गाथा,
या रुदन करूँ लिख गरीबों की भूख ... 

कैसे करूं मैं आज कविता ?

लिखूं राजनीती की बातें,
या अंकित करूं माँ की ममता ...
चर्चा करूं देश के इतिहास की,
या सिध्ध करूं युवा पीड़ी की क्षमता ...

कैसे करूं मैं आज कविता ?

कलम आज तू खुद ही कवी बनजा,
अपनी स्याही से खुद ही कोई रचना रचा ...
खुली आँखों से अँधेरा देख रहा हूँ मैं, 
और आँखें बंद करूं तो जैसे कोई कोहराम मचा ...

आज ना कर पाउँगा मैं कविता ...... !!

संकेत